काक चेष्टा बको ध्यानं श्वान निद्रा तथैव च। अल्पाहारी ब्रह्माचारी विद्यार्थी पंच लक्षणम्
विद्यार्थी के यह पांचो गुण उसके अनुशासन की ही विभिन्न सीढ़ियां है। विद्यार्थी जीवन व्यक्ति के सघन साधना का काल है
अनुशासन दो प्रकार का होता है पहला- आत्मानुशासन दूसरा- बाह्मानुशासन।
आत्मानुशासन का अर्थ है आत्मा के द्वारा अनुशासन अर्थात इसमें किसी अन्य व्यक्ति का बाध्यकारी दबाव नहीं होता तथा विद्यार्थी अपने जीवन को स्वयं प्रेरणा से अनुशासित करता है। इसमें समय पर उठना अपनी दिनचर्या के आवश्यक कार्यों का निष्पादन कर अध्ययन के प्रति जागरूक रहना तथा स्वास्थ्य के प्रति सजग रहना आदि शामिल है।
दूसरी और बाह्मानुशासन स्वयं के अलावा किसी दूसरे व्यक्ति के दबाव होने तथा उनके अधिकारों के कारण माना जाने वाला अनुशासन है।
विद्यार्थी बहुत से कार्यों में स्वयं के द्वारा परिचालित होता है।तथा बहुत से दूसरे कार्यों में शिक्षक माता-पिता तथा विद्यालय द्वारा परिचालित होता है क्योंकि विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने की अवस्था में बालक का निर्माण सीखने की प्रक्रिया में होता है इसलिए इस अवस्था में वह जो सीखता है उसके जीवन के स्थाई मूल्य बन जाते हैं संसार में अनेक महापुरुषों ने अनुशासित रहकर ही समूचे विश्व का मार्गदर्शन किया है।
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुशासन का महत्व है । अनुशासन से हि जीवन में धैर्य और समझदारी का विकास होता है । समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है । इससे कार्य क्षमता का विकास होता है तथा व्यक्ति में नेतृत्व की शक्ति जाग्रत होने लगती है । इसलिये हमे हमेशा अनुशासनपूर्वक आगे बढने का प्रयत्न करना चाहिए । मानव जीवन की सफलता का एक मात्र मंत्र ‘अनुशासन’ है ।

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